झारखंड की राजधानी रांची। यहां संत जेवियर्स कॉलेज के इतिहास के एक प्रख्यात प्रोफेसर की हत्या हो जाती है। तमाम पुलिस और जांच एजेंसियां गहरी छानबीन में जुट जाती हैं। लेकिन हत्यारे तक पहुंचना तो दूर, मामला अलौकिक शक्तियों के कारनामों में उलझ जाता है। वैसे भी झारखंड डायन, ओझा-गुणी, जैसे मामलों के लिए कुख्यात तो है ही। जितनी मुंह उतनी बातें.. बात यहां तक पहुंची कि यह कारनामा कोई इंसान नहीं बल्कि किसी अलौकिक हत्यारी शक्ति का है जो धुंआ बन कर आती है और सोने की कटार से हत्या कर फिर धुआं हो जाती है!.. कांके के एक युवा डिटेक्टिव रॉबिन होरो को यह बात पचती नहीं। जुट जाता है सच्चाई की तह तक जाने को। तब जाकर रहस्य उजागर होने लगते हैं.. पता चलता है कि हत्या के तार पलामू के तथाकथित भुतहे ऐतिहासिक किले से जुड़े हैं!.. और पूरा मामला पहुंच जाता है 300 साल पुराने वहां के चेरो राजपरिवार के गुप्त खजाने तक। प्रोफेसर की हत्या आज होती है और हत्याकांड की तारें जुड़ती हैं तीन सौ साल पुराने उस रहस्यमयी पलामू फोर्ट से!
गौर कीजिए, हत्यारे का शिकार कोई आम आदमी नहीं इतिहास का एक विद्वान प्रोफेसर है। जाहिर है मामला चौंकानेवाला है..।
बहरहाल, आपके दिमाग में कहीं देवकीनंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता संतति के पन्ने तो नहीं फड़फड़ाने लग गए.. नहीं नहीं, आज मैं उस उपन्यास के ऐय्यारों के कारनामें, रहस्य रोमांच और तिलस्मी घटनाओं की बात नहीं करूंगा। हां, इतना जरूर है कि आज हम जो बात करेंगे वह झारखंड के इतिहास से जुड़े एक अध्याय की है जिसे वर्तमान से जोड़ते हुए एक उपन्यास इन दिनों चर्चा में है, 'द सिक्रेट ऑफ पलामू फोर्ट'। बताते चलें कि इस उपन्यास के लेखक खुद विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं। युवा हैं, पेशे से डॉक्टर हैं। ऐसे में सवाल उठता है, क्या उनका यह उपन्यास महज किसी अलौकिक शक्तियों वाली दुनिया की सैर करानेवाला है? ..या फिर विज्ञान आधारित इन्वेस्टिगेशन के जरिये वास्तविक अपराधी तक पहुंच पायेगा? हां सुना है, घटनाएं भले ही काल्पनिक हो इस उपन्यास के पात्र वास्तविक हैं, जो आपको झारखंड के एक ऐतिहासिक कालखंड का भ्रमण कराते हैं। watch video..
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